सवाल यह नहीं है कि मुझे कौन करने देगा; सवाल यह है कि मुझे कौन रोकेगा | अरुणिमा सिन्हा की प्रेरणादायक कहानी
साल 2011 की एक साधारण रात थी। उत्तर प्रदेश की एक युवा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी अपने सपनों के साथ ट्रेन में सफर कर रही थी। उसका नाम था अरुणिमा सिन्हा।
उसके मन में भविष्य के अनेक सपने थे। वह अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहती थी, देश के लिए कुछ बड़ा करना चाहती थी। लेकिन कभी-कभी जीवन अचानक ऐसी परीक्षा लेता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ट्रेन में कुछ लुटेरों ने उसकी चेन और सामान छीनने की कोशिश की। अरुणिमा ने विरोध किया। वह डरने वालों में से नहीं थी। लेकिन उस विरोध की कीमत बहुत भारी पड़ी। लुटेरों ने उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।
अंधेरी रात, सुनसान रेलवे ट्रैक और असहनीय दर्द…
वह पटरी पर गिरी पड़ी थी। तभी दूसरी दिशा से आती ट्रेन उसके पैर के ऊपर से गुजर गई। उसका एक पैर कट गया। पूरा शरीर घायल था। वह घंटों तक वहीं पड़ी रही।
उस रात शायद किसी और व्यक्ति की उम्मीदें मर जातीं।
लेकिन अरुणिमा की नहीं।
अस्पताल में जब उसे होश आया और डॉक्टरों ने बताया कि उसका पैर काटना पड़ा है, तो पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लोग उसे देखकर दया प्रकट करते थे। कई लोगों को लगा कि अब उसका जीवन सीमित हो जाएगा।
लेकिन अरुणिमा के मन में कुछ और ही चल रहा था।
एक दिन अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने अपने आप से एक सवाल पूछा—
“क्या मेरा जीवन अब खत्म हो गया है?”
अगले ही क्षण उसके भीतर से आवाज आई—
“नहीं। अब मेरी असली शुरुआत होगी।”
यहीं से उसकी सोच बदल गई।
उसने तय किया कि वह ऐसा काम करेगी जिसे सुनकर दुनिया हैरान रह जाए।
जब उसने अपने परिवार और दोस्तों को बताया कि वह माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना चाहती है, तो कई लोग चौंक गए। कुछ ने कहा यह असंभव है।
एक कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया की सबसे ऊँची चोटी?
यह सुनकर लोगों ने उसे पागल तक कहा।
लेकिन अरुणिमा के मन में केवल एक ही विचार था—
“सवाल यह नहीं है कि मुझे कौन करने देगा; सवाल यह है कि मुझे कौन रोकेगा।”
उसने कठिन प्रशिक्षण शुरू किया।
हर दिन दर्द होता था।
कृत्रिम पैर बार-बार घाव देता था।
शरीर थक जाता था।
कई बार गिरती थी।
लेकिन हर बार उठ खड़ी होती थी।
उसे पता था कि एवरेस्ट केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन से जीता जाता है।
दिन महीनों में बदले और महीने वर्षों में।
आखिर वह दिन आ गया जब अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट अभियान शुरू किया।
ऊँचाई बढ़ती गई।
ऑक्सीजन कम होती गई।
ठंडी हवाएँ चेहरे को चीर रही थीं।
हर कदम एक नई चुनौती था।
कई बार ऐसा लगा कि अब आगे बढ़ना असंभव है।
लेकिन फिर उसे अस्पताल का वह बिस्तर याद आता जहाँ उसने हार मानने से इंकार किया था।
उसे वे लोग याद आते जिन्होंने कहा था कि अब वह कुछ नहीं कर सकती।
और वह एक कदम और आगे बढ़ जाती।
फिर वह ऐतिहासिक सुबह आई।
21 मई 2013।
दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट के शिखर पर अरुणिमा सिन्हा खड़ी थी।
उस क्षण केवल एक पर्वत नहीं जीता गया था।
उस दिन डर हार गया था।
निराशा हार गई थी।
दया की नजरें हार गई थीं।
जीत गई थी इंसान की इच्छाशक्ति।
जीत गया था वह विश्वास जो कहता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, अगर मन मजबूत है तो कोई भी मंजिल दूर नहीं।
जब अरुणिमा ने एवरेस्ट की चोटी पर भारत का तिरंगा फहराया, तब वह दुनिया की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बन गई जिसने यह उपलब्धि हासिल की।
उसकी कहानी करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गई।
आज भी जब कोई व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों से हार मानने लगता है, तो अरुणिमा की कहानी याद दिलाती है कि इंसान की सबसे बड़ी शक्ति उसका शरीर नहीं, उसका साहस होता है।
यदि एक लड़की अपना पैर खोने के बाद दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच सकती है, तो हम अपने सपनों तक क्यों नहीं पहुँच सकते?
जीवन में कभी-कभी रास्ते बंद हो जाते हैं।
लेकिन सपने नहीं।
हालात कठिन हो सकते हैं।
लेकिन हौसले नहीं।
और जब इंसान अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तब दुनिया की सबसे ऊँची दीवार भी उसके सामने छोटी पड़ जाती है।
यही कारण है कि अरुणिमा सिन्हा की कहानी केवल एक पर्वतारोहण की कहानी नहीं है।
यह उस अटूट विश्वास की कहानी है जो कहता है—
“अगर मेरे इरादे मजबूत हैं, तो मुझे रोकने की ताकत किसी में नहीं।”


